भारतीय गाँवों में शास्त्रीय संगीत का दिलचस्प शतकीय समारोह

भारत की सारी सभ्यताओं में संगीत सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। शास्त्रीय संगीत ध्वनि प्रधान होता है, शब्द प्रधान नहीं। इसमें महत्व ध्वनि के उतार-चढ़ाव का होता है….. न कि शब्द और उसके अर्थ का। ऐसे क्लासिकल म्यूजिक को नहीं समझने के कारण ही अनेक लोग ऊब जाते हैं जिसका कारण लोगों में जानकारी की कमी होती है…… न कि संगीत साधक की कमजोरी।

बता दें कि भारत के गाँवों में भी शास्त्रीय संगीत की समझ एवं उसमें गहरी रुचि रखने वाले ग्रामीणों की संख्या कम नहीं है। एक ओर जहाँ जालंधर शहर में हरिवल्लभ शास्त्रीय संगीत समारोह 144 वर्षों से, आंध्र प्रदेश में पंडित त्यागराज शास्त्रीय संगीत महोत्सव 119 वर्षों से तथा मध्यप्रदेश में तानसेन संगीत समारोह 94 वर्षों से टूटी कड़ियों के साथ जारी है वहीं दूसरी ओर इन साधन संपन्न महानगरों से दूर मध्य प्रदेश के दमोह जिले का निपट देहाती गाँव “बकायन” विगत 125 वर्षों से शास्त्रीय संगीत का अनवरत आयोजन कर रहा है।

यह भी जानिए कि बकायन गाँव में इस वर्ष के जन जलसे का 125वाँ शास्त्रीय संगीत समारोह 16-17 जुलाई (गुरु पूर्णिमा) को होने जा रहा है। इस आयोजन में पहली बार राष्ट्रीय नाट्य अकादमी एवं अन्य सांस्कृतिक केंद्रों के जुड़ने से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर के क्लासिकल कलाकारों के आने की सूचनाएं मिलने लगी हैंं।

चलते-चलते यह भी बता दें कि बकायन का मृदंगाचार्य नाना साहेब पानसे स्मृति समारोह इस मायने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यह आयोजन निपट देहात में होता है जहाँ के ग्रामीण भी गजब के श्रोता हैं। वे बड़े-बड़े विकट शास्त्रीय संगीतज्ञों को दो दिनों तक सुनने के लिए दिन-रात जुटे रहते हैं। कुछ श्रोतागण जहाँ 5-10 किलोमीटर दूर से पैदल चलकर क्लासिकल म्यूजिक का रसास्वादन करने आते हैं वहीं कुछ विकट श्रोतागण दो दिनों तक अपनी दुकानें बंद कर पहुंच जाते हैं….. यहाँ तक कि क्लासिकल कत्थक की प्रस्तुति देखने गाँव की पढ़-अपढ़ महिलाओं का भी तांता लग जाता है।

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