जी हाँ, कल तक जो मांझी नीतीश को ‘कीचड़’ से नहलाते नहीं थक रहे थे, आज वही परेशान हैं उनके ‘बेचारा’ और ‘बदनाम’ होने से। मांझी की मानें तो नीतीश ‘बेचारा’ हो गए हैं क्योंकि आज बिहार में ताज किसी और का और राज किसी और का है। ऐसे में बेवजह ‘बदनाम’ होने से बेहतर है कि नीतीश मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दें।
गुरुवार को अपने पटना स्थित सरकारी आवास पर पत्रकारों से बात करते हुए बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और ‘हम’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी ने कहा कि बिहार में महागठबंधन की सरकार बनने के बाद से बढ़ते ‘अनुचित दबाव’ के कारण राज्य के करीब 35 आईएएस और आईपीएस अधिकारी लिखित रूप से केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की इच्छा जता चुके हैं। इससे बिहार में शासन-व्यवस्था की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। मांझी ने हाल के दिनों में दरभंगा और वैशाली जिलों में अभियंताओं की हत्या की चर्चा की और राज्य की बिगड़ती कानून-वयवस्था पर चिन्ता जताते हुए दावा किया कि बिहार में पिछले 60 दिनों के भीतर रंगदारी, अपहरण, बैंक डकैती, लूट और हत्या जैसी करीब 600 आपराधिक घटनाएं घटी हैं और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ठोस कार्रवाई करने के बजाए ‘गीदड़ भभकी’ देने में लगे हैं।
मांझी ने हाल में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव द्वारा कथित तौर पर पटना स्थित इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (आईजीआईएमएस) का निरीक्षण करने को लोकतांत्रिक दृष्टि से अनुचित बताया। उन्होंने कहा कि पूरे देश में चर्चा है कि बिहार में ताज किसी और का और राज किसी और का है। अगर नीतीश कुमार इस कदर ‘बेचारा’ हो गए हैं और इतने दबाव में हैं कि कोई एक्शन नहीं ले सकते तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। बिहार में सचमुच जिनका राज है वे ही सत्ता चलाएं, नीतीश क्यों बेवजह बदनाम हो रहे हैं..?
इतना सब कुछ कहने के बाद मांझी ये कहना भी नहीं भूले कि वे नीतीश कुमार के प्रति ‘हमदर्दी’ रखते हैं क्योंकि नीतीश ने ही उन्हें मुख्यमंत्री बनने का मौका दिया था। यही कारण है कि वे उन्हें बेहतर सलाह दे रहे हैं। मांझी की मानें तो नीतीश इस्तीफा देकर ‘बदनाम’ होने से बच सकते हैं।
मांझी ने बहुत दिनों के बाद लेकिन बहुत सम्भल कर मुँह खोला है। एक ओर सरकार के कामकाज और राज्य की कानून-व्यवस्था पर तल्ख टिप्पणी और दूसरी ओर नीतीश को इस्तीफे के लिए कहना लेकिन उनके ‘योगदान’ को याद कर और उनसे ‘हमदर्दी’ जताते हुए, ये वास्तव में एक तीर से कई निशाने को साधने की कोशिश है। मांझी ने बेशक कड़ी आलोचना की है लेकिन हर बात के लिए ठीकरा सरकार में भागीदार लालू और उनकी पार्टी राजद पर फोड़ा है। बता दें कि विधानसभा चुनाव से पूर्व वो लालू ही थे जिन्होंने मांझी को भाजपा छोड़ महागठबंधन में आने का न्योता तक दिया था लेकिन आज जब मांझी ने मुँह खोला है तो उनके निशाने पर वही लालू हैं।
आखिर लालू के खिलाफ मोर्चा खोल क्या हासिल करेंगे मांझी..? चुनाव में एकमात्र अपनी सीट (और वो भी दो सीटों पर लड़ने के बाद) बचाने वाले मांझी को इन दिनों भाजपा से कोई तरजीह नहीं मिल रही। ऐसे में कहीं नई जमीन तलाशने की कोशिश तो नहीं कर रहे मांझी..? या फिर ‘बड़े भाई – छोटे भाई’ के बीच दरार पैदा करने के लिए ये भाजपा का ही ‘गेमप्लान’ है..?
जो भी हो, राजनीति में कभी सीधी चाल नहीं चली जाती। और आजकल तो ‘टेढ़ी’ चाल में भी इतने ‘मोड़’ और ‘घुमाव’ होने लगे हैं कि कुछ भी कहना बहुत मुश्किल हो गया है। हाँ, इतना जरूर है कि बदले हुए हालात में मांझी को अपनी ‘नाव’ और ‘पतवार’ दोनों पर फिर से विचार करना पड़ रहा है। ऐसा करना उनकी राजनीतिक मजबूरी भी है। नहीं तो कल तक तक खुद को बिहार में महादलितों का सबसे बड़ा नेता कहने वाले को कुछ दिनों के बाद ‘अस्तित्व’ के संकट से जूझना पड़ जाय तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।
मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप