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मोदी के सामने चेहरा नीतीश का, पर मुकाबले में लालू

महागठबंधन ने 243 में से 242 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी। 23 सितम्बर को जदयू, राजद और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्षों की मौजूदगी में नीतीश कुमार ने महागठबंधन की सूची जारी की। इस मामले में महागठबंधन ने निश्चित रूप से एनडीए की तुलना में अधिक ‘समझदारी’ और ‘एकजुटता’ का परिचय दिया। इन तीनों दलों का तालमेल सीट बांटने और सूची जारी करने में ही नहीं उम्मीदवारों के चयन में भी दिखा। महागठबंधन के उम्मीवारों की सूची से एक बात साफ हो गई कि ‘इंजीनियरिंग’ की डिग्री भले ही नीतीश के पास हो लेकिन इसमें ‘सोशल इंजीनियरिंग’ लालू की चली है। केवल यही नहीं, सीट-दर-सीट विश्लेषण करें तो ये भी स्पष्ट हो जाएगा कि नरेन्द्र मोदी के सामने चेहरा भले ही नीतीश का हो पर मुकाबले में लालू हैं।

आप निश्चित तौर पर जानना चाहेंगे कि ऊपर कही गई बात का आधार क्या है..? इस ‘आधार’ को जानने के लिए हमें उस ‘आधार’ तक पहुँचना होगा जिसके बूते महागठबंधन बिहार के महासमर को जीतने उतरा है। मजे की बात तो ये है कि महागठबंधन की सूची पर निगाह डालते ही हम उस ‘आधार’ तक पहुँच जाएंगे और वो भी बिना मशक्कत के। आप भले ही अचरज करें लेकिन सच ये है कि लालू के ‘आधार’ को ही महागठबंधन ने अपना ‘आधार’ बनाया है। जी हाँ, 242 उम्मीदवारों में 64 यादव और 33 मुसलमान उम्मीदवारों का होना महज संयोग नहीं है। 64 यादव उम्मीदवारों में 48 लालू के, 14 नीतीश के और 2 कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। मुस्लिम उम्मीदवारों की बात करें तो राजद के 16, जदयू के 7 और कांग्रेस के 10 उम्मीदवार मैदान में हैं। इस तरह ‘माय’ समीकरण के तहत महागठबंधन ने 64 + 33 = 97 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं जो कुल उम्मीदवारों का 40% है।

ये तो हुई यादव और मुस्लिम उम्मीदवारों की बात। अब महागठबंधन के 242 उम्मीदवारों का विश्लेषण कुछ अलग तरह से करें। ये जानना दिलचस्प होगा कि इन 242 उम्मीदवारों में 164 यानि 68% उम्मीदवार पिछड़े, अति पिछड़े तथा मुस्लिम हैं। सवर्ण तथा एससी-एसटी उम्मीदवारों की बात करें तो उन्हें 16-16% हिस्सेदारी मिली है। कुल मिलाकर, ये कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि नीतीश और कांग्रेस ने लालू की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ को ही फॉलो किया है।

महागठबंधन के उम्मीदवारों को एक और कोण से देखने के बाद इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाएगा कि मोदी से असली टक्कर लालू ले रहे हैं। 2010 में नीतीश के विजय-रथ पर भाजपा भी सवार थी और उसे 91 सीटें मिली थीं। इस बार भाजपा के कब्जे वाली इन 91 सीटों में से 41 पर नीतीश और कांग्रेस के उम्मीदवार भाजपा के सामने होंगे जबकि शेष 50 सीटों पर अकेले लालू के उम्मीदवार भाजपा से लोहा ले रहे होंगे। इन सीटों पर राजद दूसरे नंबर पर था। लालू को भरोसा है कि पिछली बार जेडीयू-भाजपा साथ थी तब उनकी पार्टी दूसरे नंबर पर थी। इस बार जेडीयू और राजद साथ हैं तो इसका सीधा फायदा उन्हें मिलेगा। देखा जाय तो लालू के इस ‘विश्वास’ को नकारना बहुत मुश्किल है। एनडीए के मार्ग में जितनी कठिनाई नीतीश के ‘सुशासन’ को लेकर है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल लालू खड़ी कर रहे हैं, यादव-मुस्लिम के साथ-साथ पिछड़ों में भी अपनी पैठ के कारण।

वैसे भी महागठबंधन के अस्तित्व में आने के बाद से लेकर अब तक एनडीए के हमले का केन्द्र-बिन्दु लालू रहे हैं। भाजपा के घोषित उम्मीदवारों की सूची में 26 यादवों की मौजूदगी भी इसी तथ्य की पुष्टि करती है। भाजपा और उसके साथी दलों ने लालू पर जितना निशाना साधा है उतना ही लालू का ‘वोटबैंक’ उनके लिए एकजुट हुआ है, ऐसा राजद खेमा मानता है। खैर, लालू का वोटबैंक उनके लिए कितना एकजुट रहेगा ये तो 8 नवंबर को मतगणना के बाद ही पता चलेगा लेकिन फिलहाल इतना तो कहा ही जा सकता है कि बिहार के इस महामुकाबले में अगर नरेन्द्र मोदी पिछड़ते हैं और ताज फिर नीतीश के सिर होता है तो ऐसा ‘किंगमेकर’ कहलाना पसंद करने वाले लालू प्रसाद यादव के कारण ही होगा, वरना नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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